Monday, 19 December 2016

टूटते तटबंध

आसमां से बूँदें नहीं 
बरसती है जानलेवा क़यामत 
जैसे ही छूती है
प्रेम पथ के राहगीरों के सब्र का बदन
सिहरने लगते हैं बेचारे 

एक दूजे को संभालने में 
कि छूने न पाए ये क़यामत
टकराती हैं झपकती अधखुली नज़रें 
छूती हैं कांपते अंतस को 
कसने लगती हैं बाहें 
खुद ब खुद

किसी फिल्म की तरह
लहराते हैं पलकों के भीगे दुपट्टे
डगमगाने लगती है सब्र की नाव 
कसने लगती है हथेली कंधों पर
उठते हैं कई कई सुनामी दिल से 

सुनकर हर अनकहा 
कहकर सब अनसुना 
सब कुछ करके अनदेखा
टूट जाते हैं तटबंध 
छूट जाती हैं सीमाएं 
और निकल जाते हैं ये राहगीर 
अपने किनारों से बाहर 

.....संयुक्ता
  

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